
- कर्नाटक के फायरब्रांड नेता अनंत हेगडे का काट दिया गया टिकट
पंकज सिंह की रिपोर्ट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अजेय हैं. चाहे गुजरात हो या देश, अबतक नरेंद्र मोदी को कोई हरा नहीं पाया है. विपक्ष के हर साजिश पर ऐसा प्रहार करते हैं कि विरोधी भी उनके कायल हो जाते हैं. विरोधियों की ओर से उछाले गये कीचड़ में वह कमल खिलाने में माहिर हैं. मौत का सौदागर, नीच, चाय बेचने वाला, चौकीदार चोर है, बिना परिवार… ऐसे कई राजनीतिक बयान का जवाब नरेंद्र मोदी ने इस तरह से दिया कि विरोधी उनपर टिप्पणी करने से पहले कई बार सोचने को विवश हो जाते हैं. बावजूद इसके कांग्रेस समेत विपक्ष के पास एक ऐसा हथियार है, जिससे नरेंद्र मोदी डरते हैं. डर ऐसा कि उस मसले पर बयान देने वाले भाजपा के नेताओं पर शिकंजा कसने में देरी नहीं करते हैं. बात हो रही है संविधान की और संविधान बदलने वाले बयान की. 2015 के बाद इस मसले पर जिसने भी कुछ कहा है, भाजपा में उसकी शामत आ गयी है.
कर्नाटक के फायरब्रांड नेता और सांसद अनंत हेगड़े की टिकट भाजपा ने 2024 लोकसभा चुनाव के पहले काट दिया है. अनंत हेगड़े ने 10 मार्च 2024 को को कहा था कि इस बार चुनाव जीतने के बाद भाजपा संविधान में बदलाव करेगी. इसी तरह राजस्थान की नागौर सीट से चुनाव लड़ रहीं भाजपा की ज्योति मिर्धा ने संविधान बदलने की बात कही, तो भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गयी. यह सिर्फ कुछ उदाहरण मात्र है, संविधान संबंधित हर बयान पर भाजपा नेताओं की क्लास ली गयी है. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल इस मुद्दा पर बीजेपी को घेरती है. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने संविधान समीक्षा संबंधित बयान दिया था, उस चुनाव में भाजपा की स्थिति किसी से छिपी नहीं है.
106 बार से अधिक बार बदला जा चुका है संविधान, कांग्रेस के नाम काला अध्याय
जब भी भाजपा नेता संविधान संसोधन या संविधान में बदलाव संबंधित बयान देते हैं, पीएम मोदी समेत भाजपा के वरीय नेता बैकफुट पर आ जाते हैं. जबकि, दूसरी ओर तथ्यात्मक सच्चाई यह है कि संविधान अंगीकार होने के बाद से अबतक 106 बार संविधान में बदलाव या संविधान में संसोधन किया गया है. संविधान का 106 वां संशोधन अधिनियम, 2023, लोकसभा , राज्य विधान सभाओं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधान सभा में महिलाओं के लिए सभी सीटों में से एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है. इसमें एससी और एसटी के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल है. जो कांग्रेस संविधान बदलाव की बात पर वर्तमान दौर में राजनीतिक रोटियां सेंकने आ जाती है, उसी कांग्रेस की स्व इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के समय 42वें संशोधन से एक साथ संविधान के 41 अनुच्छेदों में बदलाव किया था. 13 नए अनुच्छेद जोड़े थे. इसी संशोधन में लोकसभा की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष व समाजवाद शब्द जोड़ा गया. भाजपा ने संविधान में संशोधन करके अनुच्छेद 370 हटाने का वादा किया था, जिसे 2019 में पूरा किया गया. यह बड़ा मुद्दा था लेकिन भाजपा ने जब संविधान में बदलाव किया तो इसका कोई विरोध नहीं हुआ. बताते चले कि सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में केशवानंद भारती केस में संविधान के बुनियादी ढांचे का एक सिद्धांत विकसित किया है, इसमें सर्वोच्च अदालत ने संविधान की कुछ बातों को बुनियादी ढांचे का हिस्सा बताते हुए उनमें बदलाव को निषेध किया है. इसमें मौलिक अधिकार से लेकर देश में शासन की लोकतांत्रिक पद्धति और संघीय ढांचे की शासन व्यवस्था शामिल है. इसका मतलब है कि चाहे कितना भी बहुमत वाली सरकार हो, लेकिन वह मौलिक अधिकारों को नहीं खत्म कर पायेगी. ना ही लोकतंत्र को खत्म कर पायेगी और ना ही संघीय ढांचे वाली सरकार की व्यवस्था को खत्म कर पायेगी.
आखिर क्यों डरते हैं मोदी जी!
संविधान संबंधित बयान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा डिफेंसीव यानी रक्षात्मक भाव में हो जाती है. इसकी एकमात्र वजह आरक्षण है. दरअसल, भाजपा के कोई नेता जब भी संविधान संबंधित बयान देते हैं, विपक्ष उसे बाबा साहेब अंबेडकर, पिछड़ा, दलित, आदिवासी से जोड़कर प्रचार करना शुरू कर देती है. विपक्ष हर मंच से संविधान संबंधित बयान का प्रचार यह कह करने लगती है कि भाजपा आरक्षण समाप्त करना चाहती है. आदिवासी, दलित, महिला व पिछड़ों के अधिकार को कम करने की साजिश बताने लगती है. तमाम सोशल मीडिया पर इस संबंध में लंबे-लंबे लेख लिखना शुरू हो जाता है. कथित बुद्धिजीवी जान-बुझकर इस मसले पर टिप्पणी करते हैं. अंत में नुकसान भाजपा को होती है. एक बार फिर से ध्यान 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव पर देने की जरूरत है. आरएसएस के मोहन भागवत ने सकारात्मक ऊर्जा के साथ बयान दिया था, लेकिन बयान को नकारात्मक रूप से विपक्ष ने प्रस्तुत किया. चुनाव बिहार की हो रही थी, लेकिन बयान की चर्चा देश स्तर पर होने लगी. चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी.