- सीता सोरेन के भाजपा में शामिल होने के बाद फाइट बैक करता दिख रहा है कांग्रेस-झामुमो
- बीजेपी के कई नेताओं ने छोड़ा साथ, अंदर भी गुटबाजी. इसका फायदा उठाने को तैयार विपक्ष
संदीप सिंह की रिपोर्ट

2024 लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के पहले झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हेमंत सोरेन को ईडी गिरफ्तार करती है. इसके बाद नये मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर झारखंड कांग्रेस के 08 विधायक नाराज होकर दिल्ली में डेरा जमा लेते हैं. इससे पहले कि झारखंड में कांग्रेस व झामुमो अपनी परेशानियों से बाहर निकलते चुनाव आयोग 16 मार्च को लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी कर देती है. कांग्रेस व झामुमो चुनाव की तारीख को अच्छा से याद करते इससे पहले 19 मार्च को झामुमो सुप्रीमो की बहू सीता सोरेन भाजपा में शामिल हो जाती हैं. एक के बाद एक लगातार झटका झारखंड में झामुमो-कांग्रेस समेत इंडी गठबंधन को राजनीतिक रूप से बैकफुट पर खड़ा कर देती है. लेकिन, वर्तमान परिवेश में अचानक से कांग्रेस-झामुमो समेत इंडी झारखंड में फाइट पॉजिशन पर दिख रहा है. आखिर लगातार झटका के बाद इंडी गठबंधन झारखंड में इस पॉजिशन पर कैसे पहुंचा, इसकी पड़ताल करती रिपोर्ट.
शुरुआत के अच्छे लक्षण ही अब दे रहा है दर्द

चुनाव घोषणा व उसके पहले से ही भाजपा की तैयारी अन्य दलों से आगे की है. 2023 में भाजपा लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर चुकी थी. कई स्तर का सर्वे किया गया था. यहां तक कि बूथ स्तर पर मजबूती के लिए विशेष कमिटी तक का गठन किया गया था. कार्यकर्ताओं को टास्क देकर भाजपा हर स्तर से खुद को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही थी. केंद्रीय स्तर से प्राप्त निर्देश को प्रदेश, जिला, मंडल, बूथ व शक्तिकेंद्र तक पुरा किया गया. इस कारण 2024 चुनाव की घोषणा तक बीजेपी झारखंड में सबसे मजबूत दिख रही थी. इस मजबूती को देकर विपक्षी दल के कई नेता बीजेपी में शामिल भी हुए. इनमें बड़ा नाम पलामू से घुरन राम व जामा विधायक सीता सोरेन का है. इसके अलावा भी विभिन्न स्तर पर दूसरे दल के लोग भाजपा में शामिल हुए. शुरुआत में दूसरे दल के लोगों का भाजपा में शामिल होना अच्छा माना गया, लेकिन अब यही भाजपा के लिए परेशानी का कारण बन गयी.
नये-नबेले बमबम, पुराने हुए दरकिनार
दरअसल, भाजपा में नये नबेले शामिल हुए लोगों को पार्टी की ओर से कई मुख्य दायित्व दिया गया. जबकि पुराने कार्यकर्ता साइडलाईन होते दिखे. पिछले दिनों इसकी साफ झलक पिछले दिनों रांची में हुई एनडीए की बैठक में देखने को मिली थी. दुमका व हजारीबाग के मौजूदा सांसद ने बैठक से दूरी बनायी थी. पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं है, इसकी झलक विभिन्न स्तर पर हो रहे बैठकों में भी देखने को मिल रही है. धनबाद लोकसभा में प्रत्याशी घोषणा के बाद प्रदेश प्रभारी लक्ष्मीकांत वाजपेयी बोकारो के दौरे पर आये थे. इससे पहले संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह ने भी बैठक की थी. दोनों बैठकों में पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी देखने को मिली थी. कुछ महिना पहले पार्टी में शामिल लोगों को चुनाव संबंध में जिम्मेदारी दिये जाने व पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने की बात दर्जनों लोगों ने उठाया. जानकारों की माने तो यह स्थिति पुरे प्रदेश में है. इस स्थिति से निपटने में भाजपा के वरीय पदाधिकारियों को लगाया गया है. वरीय पदाधिकारी एक-एक कर पार्टी के तमाम विधायक से मुलाकात कर रहे हैं. चुनाव कार्य में लगने की बात कर रहे हैं.
कई विधायक अबतक चुनावी समर से हैं दूर
पार्टी के एक बड़े प्रदेश पदाधिकारी ने नाम छिपाने के शर्त पर बताया है कि जिस तरह से बाबूलाल मरांडी के करीबियों को दायित्व दिया जा रहा है. या जिस तरह से टिकट बंटवारा में बाबूलाल मरांडी की चली है, इससे पुराने नेताओं में शंका की भावना विकसित हुई है. बड़े नेताओं को लग रहा है कि आने वाले दिनों में सीटिंग विधायकों की टिकट काट कर बाबूलाल मरांडी के करीबियों को टिकट मिल सकता है. इस डर के भावना से कई नेता अंदर ही अंदर बिक्षुब्ध हैं. संथाल परगना क्षेत्र व पलामू क्षेत्र के कई सीटिंग विधायक जिस तरह से अभी तक खुद को चुनावी समर से दूर कर रखा है, इससे यह बात साबित भी हो रही है.
कांग्रेस-झामुमो वोट बैंक के आधार पर कर रही है काम
भाजपा में जारी आंतरिक सिर फुटव्वल को कांग्रेस-झामुमो बहुत बारीकी से देख रही है. उसके अनुसार काम कर रही है. उनके बिक्षुब्द नेताओं को अपने पाला में ले रही है. नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराने को लेकर उनके पीछे की वोट बैंक को भी ध्यान में रखा जा रहा है. मांडू से भाजपा के सीटिंग विधायक जय प्रकाश भाई पटेल व रांची के पूर्व सांसद रामटहल चौधरी को इसी तर्ज पर कांग्रेस में शामिल कराया गया है. इससे कांग्रेस कुरमी वोटर को साधने की कोशिश कर रही है. इससे पहले कुरमी वोटर का झुकाव भाजपा की सहयोगी आजसू की तरफ था. इसी तरह झामुमो ने राजमहल में आजसू का चेहरा रहे एमटी राजा को शामिल करा कर परंपरागत वोट बैंक को मजबूत किया है. बताते चले कि आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले एमटी राजा की वर्ष 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में महज 5,000 वोट से हार हुई थी. इसके अलावा झारखंड में 1932 खतियान वाले राजपूत चेहरा माने जाने वाले गढ़वा के गिरिनाथ सिंह को राजद में शामिल कराया गया. गिरिनाथ सिंह कई बार गढ़वा के विधायक रह चुके हैं. उनके बारे में माना जाता है कि पलामू प्रमंडल का एक सॉलिड वोट बैंक है, जो उनके साथ ही मूव करता है. भाजपा की आंतरिक नाराजगी, पुराने कार्यकर्ताओं की जगह नये लोगों को वरीयता मिलने, झामुमो-कांग्रेस समेत इंडी गठबंधन की वोट बैंक वाली रणनीति के कारण ही एक माह पहले तक चुनाव के केंद्र बिंदू से दूर दिखने वाली गठबंधन अचानक से फाइट पॉजिशन पर दिखने लगा है.