चेतना को ऊर्जा देने का अवसर है महाशिवरात्रि

योगेश किसलय, वरीय पत्रकार–झारखंड


विपरीत ध्रुवों और विषम परिस्थितियों से अद्भुत सामंजस्य बिठाने वाला उनसे बड़ा कोई दूसरा भगवान नहीं है। मसलन, वे अर्धनारीश्वर होकर भी काम पर विजेता हैं। गृहस्थ होकर भी परम विरक्त हैं। नीलकंठ होकर भी विष से अलिप्त हैं। उग्र होते हैं तो तांडव, नहीं तो सौम्यता से भरे भोला भंडारी। परम क्रोधी पर दयासिंधु भी शिव ही हैं। विषधर नाग और शीतल चंद्रमा दोनों उनके आभूषण हैं। उनके पास चंद्रमा का अमृत है और सागर का विष भी। सांप, सिंह, मोर, बैल, सब आपस का बैर-भाव भुला समभाव से उनके सामने है। वे समाजवादी व्यवस्था के पोषक। वे सिर्फ संहारक नहीं कल्याणकारी, मंगलकर्ता भी हैं। यानी शिव विलक्षण समन्वयक॒ हैं। शिव गुट निरपेक्ष हैं। सुर और असुर दोनों का उनमें विश्वास है। राम और रावण दोनों उनके उपासक हैं। दोनों गुटों पर उनकी समान कृपा है। आपस में युद्ध से पहले दोनों पक्ष उन्हीं को पूजते हैं। लोक कल्याण के लिए वे हलाहल पीते हैं। वे डमरू बजाएँ तो प्रलय होता है, प्रलयंकारी इसी डमरू से संस्कृत व्याकरण के चौदह सूत्र भी निकलते हैं। इन्हीं माहेश्वर सूत्रों से दुनिया की कई दूसरी भाषाओं का जन्म हुआ। शिव पहले पर्यावरण प्रेमी हैं, पशुपति हैं। निरीह पशुओं के रक्षक हैं। आर्य जब जंगल काट बस्तियाँ बसा रहे थे। खेती के लिए जमीन तैयार कर रहे थे। गाय को दूध के लिए प्रयोग में ला रहे थे पर बछड़े का मांस खा रहे थे। तब शिव ने बूढ़े बैल नंदी को वाहन बनाया। सांढ को अभयदान दिया। जंगल कटने से बेदखल सांपों को आश्रय दिया। कोई उपेक्षितों को गले नहीं लगाता, महादेव ने उन्हें गले लगाया। श्मशान, मरघट में कोई नहीं रुकता। शिव ने वहां अपना ठिकाना बनाया। जिस कैलाश पर ठहरना कठिन है। जहां कोई वनस्पति नहीं, प्राणवायु नहीं, वहां उन्होंने धूनी लगाई। दूसरे सारे भगवान् अपने शरीर के जतन के लिए न जाने क्या-क्या द्रव्य लगाते हैं। शिव केवल भभूत का इस्तेमाल करते है। उनमें रत्ती भर लोक दिखावा नहीं है। शिव उसी रूप में विवाह के लिए जाते हैं, जिसमें वे हमेशा रहते हैं। वे साकार हैं, निराकार भी।

शिव सत्य हैं , सुंदर हैं । सर्वव्यापी हैं , सर्वग्राह्य हैं । आदि हैं अनन्त हैं । सर्वहारा के हैं, सर्वसम्पन्न के हैं । ईश्वर का यही रूप है, जो राम, कृष्ण, बुद्ध सभी अवतारों के लिए पूज्य हैं। आखिर शिव में ऐसा क्या है? जो उत्तर में कैलाश से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम् तक वे एक जैसे पूजे जाते हैं। उनके व्यक्तित्व में कौन सा चुंबक है जिस कारण समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं। वे क्यों सर्वहारा के देवता हैं ? राम का व्यक्तित्व मर्यादित है। कृष्ण का उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी। वे आदि हैं और अंत भी। शायद इसीलिए बाकी सब देव हैं। केवल शिव महादेव। वे उत्सव प्रिय हैं। शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है। वे उस समाज में भरोसा करते हैं। जो नाच-गा सकता हो। यह शैव परंपरा है। सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी शिव की गहरी आस्था है। हिप्पी संस्कृति साठवें दशक में अमेरिका से भारत आई। हिप्पी आंदोलन की नींव यूनानियों की प्रति संस्कृति आंदोलन में देखी जा सकती है। पर हिप्पियों के आदि देवता शिव तो हमारे यहां पहले से ही मौजूद थे या यों कहे शिव आदि हिप्पी थे। अधनंगे, मतवाले, नाचते-गाते, नशा करते भगवान शंकर। इन्हें भंगड़, भिक्षुक, भोला भंडारी भी कहते हैं। आम आदमी के देवता भूखो-नंगों के प्रतीक। वे हर वक्त समाज की सामाजिक बंदिशों से आजाद होने, खुद की राह बनाने और जीवन के नए अर्थ खोजने की चाह में रहते॒ हैं। यही मस्तमौला ‘हिप्पीपन’ उनके विवाह में अड़चन था। कोई भी पिता किसी भूखे, नंगे, मतवाले से बेटी ब्याहने की इजाजत कैसे देगा! शिव की बारात में नंग-धड़ंग, चीखते, चिल्लाते, पागल, भूत-प्रेत, मतवाले सब थे। लोग बारात देख भागने लगे। शिव की बारात ही लोक में उनकी व्याप्ति की मिसाल है।

शिवरात्रि केवल शिव की रात्रि नही है। शिव चेतना हैं, तो पार्वती ऊर्जा। चेतना को ऊर्जा देने का अवसर है महाशिवरात्रि। लोग समझते हैं कि शिव के ज्योतिर्लिंग की संख्या 12 है, लेकिन शिवरात्रि पर शिव के 64 लिंगो का प्रदर्शन हुए। बाकी के ज्योतिर्लिंग अभी खोजे नही जा सके या तय नहीं किये जा सके। वैदिक काल में पार्वती के नाम का उल्लेख नहीं है। अम्बिका, उमा, गौरी जैसे नाम ही प्रचलित थे। ईसापूर्व 300 के आसपास केनोपनिषद में पहली बार पार्वती नाम आया। यहां देवी पार्वती को सर्वोच्च परब्रह्म की शक्ति या आवश्यक शक्ति के रूप में प्रकट किया गया है। उनकी प्राथमिक भूमिका एक मध्यस्थ के रूप में है, जो अग्नि, वायु और वरुण को ज्ञान देती है, जो राक्षसों के एक समूह की हालिया हार के बाद घमंड कर रहे थे। जाहिर है कि पार्वती अहंकार को आइना दिखाने का माध्यम भी है । शिव भी पार्वती के बिना अधूरे हैं । तभी तो उन्हें भी अर्धनारीश्वर होना पड़ा।

शिव न्यायप्रिय हैं। मर्यादा तोड़ने पर दंड देते हैं। काम बेकाबू हुआ तो उन्होने उसे भस्म किया। अगर किसी ने अति की तो उनके पास तीसरी आंख भी है। लोकगीतों में भी शिव के बिंदासपन पर भक्त दीवाने हुए जाते हैं। शाला , दुशाला शिव के मनहु न भावे। मिरगा के छाला कहाँ पाएब हो शिव मानत नाही। ‘ या फिर – ‘ हाथी औ घोड़ा शिव के मनहु न भावे बसहा बैल कहां पायब हो। ऐसे आशुतोष को प्रणाम ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *