राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि, भाग 03


डॉ हेडगेवार ने महसूस किया कि बहुसंख्यक हिंदू निरीह  बकरी बने हुए हैं, कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाए हुए है। लंबे काल से इस्लामी झंझावातों तथा अंग्रेजी सत्ता के अधीन रहने के कारण बहुसंख्यक हिंदू समाज  आत्मविस्मृति की स्थिति में है, हिन्दू अपने गौरवशाली इतिहास को  भूलते जा रहे हैं, उनके भीतर राष्ट्रीय एकात्मता का बोध क्षीण होता जा रहा है, सामाजिक समरसता धुंधली होती जा रही है, व्यक्ति आत्म केंद्रित हो गया है, समाज में घटित घटनाओं के प्रति  वह असंवेदनशील हो गया है तथा हिंदुओं में आत्महीनता का भाव गहराता जा रहा है ।

उन्होंने अनुभव किया कि जो भारत विश्व गुरु कहलाता था आज उसकी संतति मलीन भाव से युक्त हो गई है। उन्होंने संकल्प लिया कि संपूर्ण भारत को जागृत करना होगा, शेर के दांत गिरने वाली शक्ति को जगाना होगा तथा गौरवशाली परंपरा को याद कराना होगा । स्वाभिमानी, संस्कृत, अनुशासित, चरित्रवान् तथा देश-भक्ति भावना से ओत-प्रोत व्यक्तियों का संगठन तैयार करना होगा।  यही संगठन स्वतंत्रता आंदोलन का आधार स्तंभ बनेगा तथा राष्ट्र व समाज पर आने वाली आसुरी शक्तियों का दमन करने में समर्थ होगा । वही संगठन प्रत्येक विपत्ति का सामना भी करेगा । इसी विचारधारा के मन में उठते तूफान के फलस्वरूप डॉ० हेडगेवार ने 1925 की विजयादशमी  के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। दृढ़ विश्वास के साथ उनका कहना था कि भारत हिंदू राष्ट्र है, शक्ति द्वारा ही सभी कार्य संभव है तथा संगठन में ही शक्ति होती है।

… जारी रहेगा

डॉ नरेंद्र कुमार राय
धनबाद विभाग बौद्धिक शिक्षण प्रमुख (आरएसएस)

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